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आदमी ही आदमी को छल रहा है, ये क्रम आज से नही, बरसों से चल रहा है, रोज चौराहे पर होता है “सीताहरण ” जबकि मुद्दतों से ‘रावण’ जल रहा है…!!

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ए कलयुग की लंका है, चुपचाप जलाए जा, अंदर रावण बैठा है, खुद को बतलाता जा

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जब जब पुरुष ने नारी पर कुदृष्टि डाली उसका हर हाल मे पतन हुआ है चाहे वो रावण हो या दुर्योधन हो या राम रहीम

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